09 September 2012

कलम रुकना मतलब धड़कन रुकना - स्वपनेश


टूट रहा हूँ । या तराशा जा रहा हूँ । जैसी वजनदार बात से अपने ह्रदय की गहरी संवेदनाओं को व्यक्त करने वाले स्वपनेश चौहान से आपका परिचय कराते हैं । वैसे स्वपनेश का परिचय देने के लिये मुझे शब्दों का ताना बाना बुनने की जरूरत नहीं है । स्वपनेश अपना परिचय आप ही हैं । स्वपनेश अपने परिचय में कहते हैं -  मन की बात - रोज दो आँखों और दो कानों से जो कुछ दिल के समुन्दर तक जाता है । उनमें से जो सतह पर ही रह जाता है । वो तो ज़ुबाँ से बाहर आ जाता है । लेकिन जो समुन्दर की तलहटी में चला जाता है । अक्सर वो ज़ुबाँ से बाहर नहीं आता । और कलम से अक्सर बाहर आ जाता है । जिस तरह से कोई कलश समर्थ नहीं होता कि वो समुन्दर को नाप सके । उसी तरह से ये शब्द भी समर्थ नहीं हैं कि वो पूरी तरह से दिल की भावनाओं को व्यक्त कर सकें । और समर्थ हो भी क्यों ? जिस दिन ये समर्थ हो गये । क्या उस दिन कलम रुक नहीं जाएगी । और कलम का रुक जाना । क्या मेरे लिए धड़कन का रुक जाना नहीं होगा ? खैर.. जब तक धड़कन चल रही है । मेरी कलम भी यहाँ पर चलती रहेगी । और इनका ब्लाग है - आखिरी पथ । ब्लाग पर जाने हेतु क्लिक करें । 

5 comments:

अरुन शर्मा said...

हम कतार में हैं राजीव जी का ध्यान शायद पड़ जाए.

rakesh srivastava said...

www.rakeshkirachanay.blogspot.com

राकेश कुमार श्रीवास्तव said...

मेरी रचना आप ही के विचार को शब्द देने की एक छोटी सी प्रयास मात्र है|

Rajesh Kumari said...

आपकी इस उत्कृष्ट रचना की चर्चा कल मंगलवार ११/९/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका स्वागत है

Anonymous said...

Interesting post )
http://yefehqhnf.com my blog

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