03 October 2011

चाहा कि तुझको छुपा लूँ मैं कहीं - पूनम

पूनम जी अपने बारे में कहती हैं - पुराने पन्नों से मेरी हर कविता हर नज़्म तुम्हीं से शुरू और तुम पर ही ख़त्म होती है । कभी मेरे ख्यालों से दूर जाओ । तो कुछ और भी लिखने की सोचूँ ? जब मैंने लिखना शुरू किया । यही पहली कुछ लाइनें थी मेरी । तब नहीं सोचा कि इतना कुछ लिखने लगूँगी । तबसे अब तक अच्छा बुरा जो लिखा । प्रत्यक्ष और परोक्ष में वो मौजूद है । मेरे साथ । मेरे पास । उसे हर समय । हर जगह महसूस किया । अच्छे बुरे हर समय वो मेरे साथ था । तब भी । और आज भी । ज़िन्दगी में जो भी पाया । उसी ने दिया । आज जैसी भी हूँ । पूरी की पूरी उसी की creation हूँ । कच्ची उम्र की रचनाएँ शायद कच्ची ही थीं । जो उमृ समय और परिस्थितियों के साथ परिपक्व होती गईं । शायद ये मेरा अपना ख्याल हो सकता है । पर सबकी सब मेरे दिल के बहुत नज़दीक हैं । हकीकत की तरह । जिस दिन लिखना शुरू किया था । उस दिन भी बस यूँ ही लिखना शुरू कर दिया था । जब ब्लॉग पर लिखना शुरू किया । उस दिन भी बस यूँ ही लिखना शुरू कर दिया । शायद इसीलिए..इनका ब्लाग - तुम्हारे लिये

6 comments:

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) said...

are vaah....hamaare liye...!!padhkar bhi aisaa hi lagaa....ki ye sab kuchh hai hamaare liye....

सुरेश शर्मा (कार्टूनिस्ट) http://sureshcartoonist.blogspot.com/ said...

please add my new blog -
http://sureshpolpatti.blogspot.com/

कर्तव्य (DUTY) said...

आपको दीपावली के इस शुभ अवसर पर मंगल-कामनाये |
परिवार, समाज और देशवाशियों में इन सांकेतिक दीपों की रौशनी आन्तरिक स्वरूप को प्रकाशित करे और मधुरताओं का संचार फैले ईश्वर से मेरी प्रार्थना है |
*
आपका स्नेही यशवंत

Anonymous said...

Beautifully written blog post. Delighted Im able to discover a webpage with some insight plus a very good way of writing. You keep publishing and im going to continue to keep reading.

Anonymous said...

cesse et toutes les matieres stercorales etaient,

Anonymous said...

ultimo suspire ni mueren porque se para su,

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