01 July 2011

ख़ुशी लुटाईए ज़नाब - चन्द्रभूषण मिश्रा " गाफ़िल "

मेरी पैदाइश बस्ती ज़िले के एक मध्यवर्गीय जमींदार परिवार में हुई । लेकिन मेरे पैदा होने तक जमींदारी मटियामेट हो चुकी थी । बस ऐंठन बाकी थी । मेरे वालिद ने उच्च शिक्षा हेतु मेरा दाख़िला इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कराया । पर पढ़ाई के दौरान ही उनका इंतकाल हो गया । जैसे तैसे शिक्षा पूरी की । इकलौती औलाद होने के नाते मुझे घर को संभालने  वापस आना पड़ा । पढ़ाई लिखाई का शौक़ था । और गाँवं के ही क़रीब ही महाविद्यालय के पुस्तकालय में नौकरी मिल गयी । तो यह शौक़ भी पूरा हुआ । मीर तथा ग़ालिब की ग़ज़लें पढ़ पढ़कर हुई तुकबन्दी की शुरुआत ने ग़ाफ़िल बना दिया । अब बतौर ग़ाफ़िल आपके सामने हूँ । आपसे मेरी यही इल्तिजा है कि - या पे तो बिन बुलाए चले आईए ज़नाब । ख़ुश होईए भी और ख़ुशी लुटाईए ज़नाब । अब आ ही गये मेरे अंजुमन में तो रुकिए । जाना है तो चुपके से चले जाईए ज़नाब । बन तो गया हूँ बुत मैं, भले संगेमरमरी । अब छोड़िए भी और ना बनाईए ज़नाब । 'ग़ाफ़िल' हूँ मेरी बात हँसी में उड़ाईए । ख़ुद पे यक़ीन हो तो मुस्कुराईए ज़नाब । इनका ब्लाग - ग़ाफ़िल की अमानत

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