24 March 2011

हाँ कल अपनी भी बारी है । संध्या शर्मा

धरे रह गए साधन सारे । नाकाम तकनीकें सारी हैं । क्यों रोना अब देख तबाही । जब खुद ही की तैयारी है । कुदरत के कानून के आगे । क्या औकात हमारी है । थमा नहीं ये कहर देख लो । वह तो अब भी जारी है । संभल सको तो संभलो वर्ना । कल अपनी भी बारी है..। (.जी हाँ आपने सही कहा संध्या जी ) ।..प्रकृति के तांडव से भला किसकी रिश्तेदारी है । कल जापान की थी । तो आगे अपनी भी बारी है ।..ऐसे ही झकझोरने वाले विचार संध्या जी अपनी कविताओं में व्यक्त करती हैं । ( आगे संध्या जी अपने बारे में क्या कह रही हैं )  लिखने का शौक तो बचपन से था । ब्लॉग ने मेरी भावनाओं को आप तक पहुँचाने की राह आसान कर दी । काफी भावुक और संवेदनशील हूँ । कभी अपने भीतर तो कभी अपने आसपास जो घटित होते देखती हूँ । तो मन कुछ कहता है । बस उसे ही एक रचना का रूप दे देती हूँ । आपके आशीर्वाद और सराहना की आस रखती हूँ । Location: Nagpur : Maharashtra : India ब्लाग...मैं और मेरी कवितायें

14 comments:

किलर झपाटा said...

बहुत रोचकता से लिखा हुआ आलेख राजीव जी।

Patali-The-Village said...

संध्या जी को बहुत बहुत बधाई|

: केवल राम : said...

संध्या शर्मा जी को बधाई ..और आपका आभार

Atul Shrivastava said...

संध्‍या जी को शुभकामनाएं

दर्शन कौर धनोए said...

Sndhya ji se parichy karvaane ka sukriya Rajivji !

संजय भास्कर said...

संध्‍या जी को बहुत बहुत बधाई|

संजय भास्कर said...

संध्‍या जी को बहुत बहुत बधाई|

संजय भास्कर said...

बहुत बहुत बधाई

Kailash C Sharma said...

बहुत बहुत शुभकामनायें!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

संध्या जी से परिचय करवाने के लिए धन्यवाद!

रजनी मल्होत्रा नैय्यर said...

bahut hi prerak vichar hain sandhya ji ke ......badhai rachnaon ke liye ..

Anonymous said...

Nice site , i have bookmarked it for later use, thanks.

Anonymous said...

benutzt man auch beim gahrenden Brotteige,

Anonymous said...

werden diese zuerst reducirt und durch die,

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