08 March 2011

कभी तो आदमी बन जाये आदमी फिर से । कुंवर कुसुमेश

कुंवर कुसुमेश जी को पढना एक अलग सी सुखद अनुभूति देता है । डिवीजनल मेनेजर पद से रिटायर्ड और जीवन के अनुभवों से वावस्ता कुसुमेश जी के अन्दर का परिपक्व कवि अपने शब्दों से हौसला अफ़जाई करता है.." जो ख़ुद को करके हवाले नसीब के सोया । उसे 'कुँवर' की जगायेगी शायरी फिर से ।" यही नहीं कुंवर जी की शायरी उम्मीद का दामन नहीं छोङती.." खिज़ां से डर के बहारों के ख़्वाब मत छोड़ो । गुलों पे आयेगी इक रोज़ ताज़गी फिर से ।" और कुंवर जी की ये आशा किरण चमकती ही रहती है.." गुलों पे आयेगी इक रोज़ ताज़गी फिर से । अँधेरा चीर के आयेगी रोशनी फिर से । ये शाख देखना हो जायेगी हरी फिर से ।" इस तरह कुंवर जी का एक एक शब्द जिन्दगी के विभिन्न रंगो से ओतप्रोत है ।..आगे कुंवर जी अपने बारे में बता रहे हैं..I am a poet & a retired Divisional Manager of LIC.My three books have been published.For details,please see my blog: kunwarkusumesh MOB : 094155 18546
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